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Astrology / Why a Monk Invented Wine ? क्यों एक संत ने ही शराब की खोज की ?

क्यों एक संत/विचारक/दार्शनिक ने ही शराब खोजी ?
कौन है वो और क्यों?
First you check 
 “who is God of WINE ?”

       नमस्कार दोस्तों 
आज मैं  इसी सवाल का उत्तर देने की कोशिश करूंगा । जब मुझे इस बात का पता चला दोस्तों तो मुझे भी उतनी ही हैरानी हुई, जितनी कि आप लोगों को हो रही होगी कि कोई संत, या विचारक, या कहें एक अच्छी सोच का व्यक्ति, एक आध्यात्मिक व्यक्ति, जो दुनिया को एक अलग दृष्टिकोण से देखता है, जो दुनिया को सही दिशा देना चाहता है, जो लोगों का सही मार्गदर्शन करना चाहता है, वह व्यक्ति शराब का अविष्कार क्यों करेगा ? वह क्यों शराब की खोज करेगा ?

                  यह सवाल मुझे बहुत परेशान कर रहा था तो इसके लिए मैंने उस व्यक्ति के बारे में जानना शुरू किया।  ऐसा कौन सा संत है और उसे क्या जरूरत पड़ी और वह कौन है और उसने ऐसा कब किया? यह हम आगे बात करेंगे पर अभी मैं आपको बता दूं कि एक संत को क्या जरूरत पड़ी थी कि उसे एक नशे की खोज करनी पड़ी ।शराब एक नशा है और संत को ऐसा क्या लगा, एक बुद्धिजीवी व्यक्ति को, एक विचारक को ऐसा क्या लगा कि उसे शराब की खोज करनी चाहिए तो इसका जब जवाब मिला तो मुझे बहुत हैरानी और संतुष्टि का अहसास हुआ। हैरानी इस बात की कि मेरा ध्यान इस तरफ पहले क्यों नहीं गया।

                              तो चलिए दोस्तों अब समझते हैं कि एक संत ने क्यों शराब की खोज करी ? 
शराब क्या है ?           शराब एक नशा है।

 शराब क्यों पीते ?
 शराब लोग नशा करने के लिए पीते हैं ताकि वह अपने मस्तिष्क को, अपने शरीर को कुछ समय तक के लिए नशे में रख सके, शराब या शराब जैसे और भी जो नशे की चीजें उपलब्ध है उसका सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है कि वे लोगों को कुछ टाइम तक सरूर में रखती है। एक अलग ही दुनिया में रखती है। उसे हम नशा कहते हैं और लोग नशे के लिए इसको करते हैं।

 अब सवाल यह उठता है कि क्या यह सही है?
 नहीं दोस्तों यह नशा सही नहीं है क्योंकि यह एक नकली नशा है। शराब एक नकली नशा है । शराब जैसी जितनी भी वस्तु हैं इस धरती पर मौजूद वह एक नकली नशा है। शराब नकली नशा है, इसलिए है क्योंकि वह वक्त के साथ उतर जाता है।
 आपने देखा होगा जो रंग उतर जाता है हम उसे कहते यह तो कच्चा रंग है, यह तो नकली रंग है। यह तो वक्त के साथ उतर गया इसलिए यह एक नकली रंग है ।
 पर जो रंग कभी नहीं उतरता एक बार चढ़ने के बाद हमेशा के लिए रहता हम उसे कहते हैं यह तो पक्का रंग है, यह तो असली रंग है।
 ठीक उसी प्रकार जो नशा वक्त के साथ उतर जाए उसे नकली नशा कहते है और जो नशा वक्त के साथ कभी नहीं उतरता हम उसे असली नशा है। आप उस नशे को एक बार करने के बाद हमेशा उस नशे में डूबे रहते हो। उसे ही हम असली नशा कहते हैं। यह तो हो गई असली और नकली नशे की बात।

               चलिए अब समझते हैं कि एक संत को क्या जरूरत पड़ी थी कि वह एक नशे की खोज करें।
 तो हम इसको इस तरीके से समझते हैं कोई नकली नोट कब छापता है, जब उसने असली नोट देखा होता है।
 उसे असली नोट की कीमत पता होती है, उसकी कदर होती है। तभी वह नकली नोट छापता है। इसी प्रकार जब किसी को असली नशे के बारे में पता होता है तभी वह नकली नशा बनाने की सोचता है । 

                         असली नशे से मेरा तात्पर्य क्या है ? असली नशे से मेरा तात्पर्य है वह नशा जिसमें हम एक बार डूब जाए तो आजीवन उसी में डूबे रहे। कभी भी उससे बाहर ना आए ।

       वह नशा है    ज्ञान का नशा,  भक्ति का नशा,  वह नशा है अध्यात्म का नशा। जो व्यक्ति इस नशे में डूबा है उसे ही इसका आनंद प्राप्त है। वह चाहता है कि लोग इस तरह के नशे में डूबे और आनंद प्राप्त करें और अपना जीवन सुखमय, आनंदमय बिताएं। पर जब उसे यह मालूम पड़ता है कि लोग असली नशे तक नहीं पहुंच पाएंगे। लोगों के पास बहुत सारी वजह है असली नशे तक ना पहुंचने की।
 नकारात्मकता है उसकी सबसे बड़ी वजह, आलस्य है उसकी सबसे बड़ी वजह तो क्यों ना इन लोगों को एक ऐसा नशा दिया जाए जो थोड़ी देर के लिए उन्हें उसी तरह के आनंददायक, डर हीन जीवन का अहसास कराएं।
 हो सकता है उसके बाद, नकली नशे को करने के बाद, नकली नशा करते करते, असली नशे की खोज करें या अपने से उसको जरूरत महसूस हो और वह हमेशा के लिए अपने से असली नशा करें जो भक्ति का है, जो ज्ञान का है, जो अध्यात्म का है ।

 इसके पीछे की मंशा एक शराब का व्यापारी बनने की नहीं थी, या लोगों को नशे की लत लगाने की नहीं थी। वह एक अलग बात है कि वक्त के साथ हमने इस शराब को गलत तरीके से अपने जीवन में लिया। आज भी आप पश्चिमी देशों में शराब पीने का तरीका देखें और एशियाई देशों में या भारत में अगर आप इसको पीने का तरीका देखे तो यह बहुत अलग है । यहां पर शराब नशे के लिए पी जाती है। वह नशा जिसको पीने के बाद व्यक्ति उत्तेजित होता है और अपने होश खो बैठता है। जबकि असली नशा जो की भक्ति का है, अध्यात्म का है, ज्ञान का है  वह नशा व्यक्ति को होश में लाने के लिए है।

                      मुझे नहीं पता कि उस संत की इसके पीछे की सोच सही थी या गलत थी।
 यह आप अपनी बुद्धि और विवेक से खुद फैसला करें। पर मैं यह मानता हूं निजी तौर पर कि अगर कोई फैसला गलत भी हो जाए पर उस फैसले के पीछे की भावना सही हो तो भी हमें उस फैसले का सम्मान करना चाहिए, अगर फैसला सही है पर भावना गलत थी तो भी उस फैसले की आलोचना करनी चाहिए। यह मेरा निजी मानना है।
    
                अब मैं आपको बताऊंगा उस संत के बारे में  कि वह संत कौन था, उस संत का नाम क्या था और उस समय कुछ उपलब्धियां और वह किस देश से संबंध रखता था और किस काल में।
              
                        DIONYSUS / डओंसीस 
                एक संत, एक दार्शनिक, एक विचारक

        GOD  OF  WINE      के नाम से मशहूर 

 तो चलिए आगे पढ़ते रहिए इसके विषय में मैं अपने अगले भाग में लिखूंगा
  

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